दशकों से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इस धारणा पर काम कर रही थी कि वैश्विक समस्याओं के लिए सभी देशों द्वारा हस्ताक्षरित सार्वभौमिक संधियों की आवश्यकता है। हालांकि, सार्वभौमिकता की खोज अक्सर कमजोर समझौतों में बदल जाती है।
व्यावहारिक गठबंधनों का उदय
आज प्रभावी कूटनीति विशिष्ट क्षेत्रों में सहयोग के इच्छुक देशों के गठबंधनों द्वारा मॉड्यूलर समझौतों पर निर्भर करती है। ये समझौते सख्त तकनीकी मानकों और आर्थिक लाभों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
हाल ही में ब्रसेल्स में हुए ग्रिड समझौते और जिनेवा में रोगज़नक़ डेटा प्रोटोकॉल ने साबित कर दिया है कि व्यावहारिक दृष्टिकोण जटिल वैश्विक वार्ताओं की तुलना में अधिक उपयोगी है।
आपसी हित से स्थिरता
जो संधियां केवल नैतिक घोषणाओं पर आधारित होती हैं, वे राजनीतिक बदलाव के समय कमजोर हो जाती हैं। इसके विपरीत, वास्तविक बुनियादी ढांचे से जुड़े समझौते लंबे समय तक टिके रहते हैं क्योंकि वे सभी पक्षों को स्पष्ट लाभ प्रदान करते हैं।